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इच्छामृत्यु क्या है? इच्छामृत्यु (दया-हत्या) का अर्थ है किसी व्यक्ति के असहनीय कष्ट से राहत पाने के लिए उसकी मृत्यु की इच्छा के अनुरूप जीवन समाप्त करना। इसमें आमतौर पर ऐसे रोगी शामिल होते हैं जिनकी बीमारी अब असाध्य हो चुकी है या वे स्थायी वेजिटेटिव अवस्था में हैं। उदाहरणतः यदि एक व्यक्ति कैंसर जैसी अंत्यवासनिक अवस्था में हो और अत्यधिक दर्द से जूझ रहा हो, तो इच्छामृत्यु उसका दर्द कम करने के उद्देश्य से शुरू की जाने वाली प्रक्रिया हो सकती है। निष्क्रिय इच्छामृत्यु में जीवनरक्षक उपचार रोक दिया जाता है, जबकि सक्रिय इच्छामृत्यु में जानबूझकर घातक दवा देकर मृत्यु लाने का प्रयास किया जाता है। इच्छामृत्यु के प्रकार सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia): इस प्रकार में रोगी की जान लेने के लिए प्रत्यक्ष कदम उठाए जाते हैं, जैसे कोई डॉक्टर जानलेवा इंजेक्शन दे देता है। उदाहरण के लिए, डॉक्टर द्वारा जानबूझकर घातक इंजेक्शन देना जिससे रोगी की मृत्यु हो जाए। भारत में सक्रिय इच्छामृत्यु अवैध है; इसे हत्या या आपराधिक मानववध माना जाता है। सरकार के नये दंड संहिता (Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023) में भी किसी की जान लेने को सजा- योग्य अपराध माना गया है। निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia): इसमें रोगी के जीवन को बनाए रखने वाले जीवनरक्षक उपचार को बंद कर दिया जाता है, जिससे मृत्यु स्वाभाविक रूप से हो जाती है। इसमें शामिल कदमों में वेंटिलेटर हटाना, कृत्रिम पोषण या पानी बंद करना और लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाना हैं। निष्क्रिय इच्छामृत्यु में डॉक्टर मौत नहीं देते, वे केवल जीवनरक्षक उपचार रोक देते हैं। भारत में सुप्रीम कोर्ट ने कड़े शर्तों के साथ इसे वैध माना है। यानी जब रोगी की गंभीर हालत में ठीक होने की उम्मीद समाप्त हो और उपचार केवल कष्ट बढ़ा रहा हो, तब न्यायालय की मंजूरी से जीवनरक्षक उपचार हटाया जा सकता है। कानूनी अंतर: सक्रिय बनाम निष्क्रिय सक्रिय इच्छामृत्यु: इसमें मृत्यु का कारण प्रत्यक्ष क्रिया (जैसे इंजेक्शन) होती है। कानूनी दृष्टि से इसे हत्या या आपराधिक मानववध माना जाता है। डॉक्टर या अन्य व्यक्ति जो रोगी की इच्छा से मृत्यु का कारण बनता है, कानूनन सजायाफ्ता हो सकता है। निष्क्रिय इच्छामृत्यु: इसमें उपचार को रोककर प्राकृतिक मृत्यु होने दी जाती है। इसे ‘मरने देना’ माना जाता है, ना कि ‘मारना’। सुप्रीम कोर्ट और स्वास्थ्य मंत्रालय के दिशानिर्देशों के मुताबिक जीवनरक्षक इलाज बंद करना वर्तमान में न्यायिक निगरानी में वैध है। भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु को कानूनी दृष्टि से भेदभावपूर्ण माना गया है; इसमें रोगी की स्वैच्छिक सहमति और चिकित्सकों की रिपोर्ट आवश्यक होती है। भारत में इच्छामृत्यु का कानूनी विकास Gian Kaur v State of Punjab (1996): इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पहले के Rathinam मामले को पलटते हुए कहा कि अनुच्छेद 21 में ‘मरने का अधिकार’ शामिल नहीं है। इसलिए आत्महत्या में सहायता देना भी कानूनन अपराध माना गया। अदालत ने प्रतिवादियों की अपील खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि जीवन का अधिकार प्राकृतिक मृत्यु को तेज करने का अधिकार नहीं देता। Aruna Ramchandra Shanbaug v Union of India (2011): इस ऐतिहासिक मामले में Aruna Shanbaug 42 वर्षों तक वेजिटेटिव अवस्था में रहीं। सुप्रीम कोर्ट ने रुग्ण की जिंदगी खतरे में न होने की पुष्टि के बाद कड़े दिशानिर्देशों के साथ निष्क्रिय इच्छामृत्यु की वैधता मान्य की। यद्यपि अरुणा के मामले में खाना-पानी रोकने का अनुरोध रद्द कर दिया गया, कोर्ट ने निष्क्रिय euthanasia को न्यायिक निगरानी में मान्यता दी। अदालत ने कहा कि न्यायालय (Parens Patriae के सिद्धांत) परिवार के संरक्षक की तरह रोगी का कल्याण तय कर सकता है। Common Cause v Union of India (2018): इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने “गरिमा के साथ मरने का अधिकार” को मौलिक अधिकार माना और स्पष्ट किया कि व्यक्ति अपने शरीर पर निर्णय ले सकता है। अदालत ने Living Will (जन्मत: निर्देश) की वैधता को स्वीकार किया, जिससे कोई भी स्वस्थ व्यक्ति पहले से निर्देश दे सकता है कि अंत्यवासनिक अवस्था में जीवनरक्षक इलाज न दिया जाए। अदालत ने टर्मिनल मरीजों के लिए दिशानिर्देश भी जारी किए, जिसके बाद अस्पतालों और परिवारों को निर्णय लेने में सहायता मिली। हरिश राणा मामला (2026): हाल ही में मार्च 2026 में 32 वर्षीय हरिश राणा के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार प्रथम निष्क्रिय euthanasia को मंजूरी दी। हरिश पर 13 वर्ष बाद केमिकल बदलावों ने कोई सुधार नहीं दिखाया था। इस निर्णय ने प्रदर्शित किया कि जब ठीक होने की संभावना ना हो, तब कोर्ट उपचार रोकने की इजाज़त दे सकती है। सरकारी दिशा-निर्देश (2024): स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने सितंबर 2024 में प्रस्थावित “टीबी से पीड़ित टर्मिनल मरीजों के लिए life support withdrawal” के ड्राफ्ट गाइडलाइंस जारी किए। इन प्रस्तावित दिशानिर्देशों में टर्मिनल बीमारी की परिभाषा, 72 घंटे बाद भी कोई सुधार न दिखने वाली गंभीर मस्तिष्क चोट, मस्तिष्क तने की मृत्यु (brainstem death) जैसी अवस्थाएं शामिल हैं। दस्तावेज़ में कहा गया है कि इन परिस्थितियों में जीवनरक्षक उपचार जारी रखना मरीज और परिवार के लिए अतिरिक्त कष्ट व आर्थिक बोझ बढ़ाता है। इसमें रोगी या उसके परिवार द्वारा लिखित सहमति और सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन अनिवार्य होगा। इन नीतियों को लागू करने पर विशेषज्ञों ने भी चर्चा की है। वेजिटेटिव अवस्था क्या है? वेजिटेटिव अवस्था (Vegetative State) वह स्थिति है जिसमें मस्तिष्क को गंभीर क्षति पहुंचने के बाद मरीज तो जागृत रहता है (आँखें खुली हो सकती हैं, नींद-जागरण चक्र बना रहता है) लेकिन किसी भी तरह की संज्ञानात्मक जागरूकता नहीं होती। इसमें रोगी सामान्य प्रतिक्रियाएं नहीं देता, न बोल सकता है और न अपने परिवेश को पहचान सकता है। मुख्य विशेषताएँ हैं: रोगी नींद-जागृत चक्र कायम रखता है, आँखें खुली रहती हैं लेकिन कोई अभिव्यंजक प्रतिक्रिया नहीं होती। समझने या बोलने की क्षमता पूरी तरह समाप्त रहती है; मरीज न तो बात समझ पाता है और न स्वयं बोल सकता है। श्वसन एवं पाचन जैसी मूल शारीरिक क्रियाएँ बनी रह सकती हैं। इस स्थिति में रोगी लंबे समय तक केवल मशीनों पर निर्भर रहता है। ऐसे मामलों में इच्छामृत्यु का प्रश्न अधिक तीव्रता से उठता है क्योंकि रोगी की कोई स्वचालित प्रतिक्रिया या सुधार की संभावना नहीं होती। इच्छामृत्यु क्यों विवादास्पद है? इच्छामृत्यु न केवल कानूनी बल्कि नैतिक, धार्मिक और सामाजिक स्तर पर भी गहन बहस का विषय है। इसके पक्ष में तर्कों में शामिल हैं: गरिमा के साथ मरने का अधिकार: समर्थक कहते हैं कि किसी को अपने शरीर पर अधिकार है और वह तय कर सकता है कि उसका जीवन कब और कैसे समाप्त हो। terminal मरीज जो भारी दर्द में हैं, उन्हें अवैध इलाज से बचने और मरने के तरीके चुनने का अधिकार मिलना चाहिए। जीवन को कृत्रिम रूप से तब तक बनाये रखना जब तक उम्मीद न हो, कई लोगों के लिए अमानवीय लगता है। दर्द और कष्ट से मुक्ति: अनेकों का तर्क है कि असाध्य रोगों में जब दर्द असहनीय हो चुका हो, तो दया के आधार पर मृत्यु की अनुमति देना दया और मानवता है। सक्रिय उपचार कष्ट को लंबित कर देता है, जबकि निष्क्रिय उपाय से व्यक्ति जल्द आराम पा सकता है। करुणा और परोपकार: कई चिकित्सक और विशेषज्ञ मानते हैं कि जीवन की गुणवत्ता न होने पर इलाज छोड़ देना परोपकारी कदम है। जरूरतनुसार इलाज बंद कर देने में मरीज को और परिवार को मानसिक शांति मिलती है, इसे मानवीय संवेदना समझा जाता है। विरोधियों के तर्कों में प्रमुख हैं: जीवन की पवित्रता: अधिकांश धार्मिक और सामाजिक परंपराओं में मानव जीवन को पवित्र माना जाता है और उसका जानबूझकर अंत करना गलत समझा जाता है। जीवन को ईश्वर या प्रकृति का अनमोल उपहार मानते हुए, इसपर किसी का कब्ज़ा अवैध माना जाता है। स्लिपरी स्लोप (फिसलनपूर्ण ढलान): आलोचक डराते हैं कि यदि euthanasia की अनुमति दी गई तो समय के साथ इसका दायरा बढ़ता जाएगा। कुछ यूरोपीय देशों में देखा गया कि शुरुआत में केवल terminal बीमारों के लिए बनी सीमाएं धीरे-धीरे कमजोर हुईं। इससे मानसिक रूप से कमजोर लोगों, बुज़ुर्गों या बच्चों के लिए भी दबाव बढ़ सकता है। दुरुपयोग और दबाव: कमजोर रोगी (बुज़ुर्ग, विकलांग आदि) परिवार या सामाजिक दबाव में आकर euthanasia चुन सकते हैं। आर्थिक या भावनात्मक बोझ कम करने के चक्कर में बीमार को मरने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। वास्तव में यह सुनिश्चित करना मुश्किल है कि रोगी की सहमति पूरी तरह स्वतंत्र और सूचित है। चिकित्सकीय नैतिकता: चिकित्सक-क्षेत्र में “कभी हानि नहीं करो” (विधिपरक श्रेयस्कर) सिद्धांत चलता है। डॉक्टर को रोगी को बचाने की शपथ दी जाती है, न कि जीवन छीनने की। डॉक्टर और मरीज के बीच विश्वास भंग हो सकता है यदि डॉक्टर के पास मौत प्रदान करने की शक्ति हो। बदलाव की आवश्यकता: विरोधी यह भी कहते हैं कि रोगी की कष्ट को दूर करने के लिए बेहतर देखभाल (palliative care) विकसित करना चाहिए, न कि मौत के विकल्प को बढ़ावा देना। मानवता बेहतर हो सकती है यदि हम दर्द निवारक तकनीकों को सशक्त करें न कि मृत्यु के विकल्प को स्वीकृत करें। उल्लेखनीय है कि यह बहस केवल भारत तक सीमित नहीं है; विश्व भर में जब-जब euthanasia के कानूनीरण की कवायद होती है, तब-तब ये बहस तेज हो जाती है। हाल के निर्णयों का महत्व हाल के सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से इच्छामृत्यु के क्षेत्र में कानूनी स्पष्टता आई है और रोगी की गरिमा को पहले से अधिक मान्यता मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि विधायिका को इच्छामृत्यु पर कानून बनाना चाहिए, क्योंकि मौजूदा दिशा-निर्देश केवल अस्थायी समाधान हैं। अदालत ने जोर देकर कहा कि “गरिमा के साथ मरने का अधिकार” मौलिक अधिकार का हिस्सा है और इसे सुनिश्चित करने के लिए नियमों की आवश्यकता है। इन फैसलों ने अस्पतालों, डॉक्टरों और परिवारों को मार्गदर्शन दिया है कि terminal मरीज की इच्छा का सम्मान कैसे हो सकता है। निष्कर्ष भारत में इच्छामृत्यु विषय संवेदनशील है और इसे लेकर संतुलित दृष्टिकोण अपनाया जा रहा है। जहां सक्रिय इच्छामृत्यु अब भी अवैध है और इसे दंडनीय माना जाता है, वहीं निष्क्रिय इच्छामृत्यु को सुप्रीम कोर्ट ने सीमित परिस्थितियों में मान्यता दे दी है। अदालतों ने “जीवन और मृत्यु के साथ गरिमा” के सिद्धांत को मजबूत करते हुए मरीजों को अधिकार दिए हैं, लेकिन साथ ही परिवार एवं चिकित्सा अधिकारियों के लिए कड़े नियम भी निर्धारित किए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने विधायिका को इस विषय पर स्पष्ट कानून बनाने का आग्रह किया है। भविष्य में पूर्णरूपेण स्पष्टता और सुरक्षा हेतु एक समग्र विधेयक की आवश्यकता महसूस की जाती है। इच्छामृत्यु से जुड़े निर्णयों ने अब तक न्यायिक संतुलन बनाए रखा है, जिससे रोगियों की इच्छाओं और उनकी गरिमा का सम्मान हो सके। स्रोत: सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों, सरकारी दिशा-निर्देशों एवं विशेषज्ञ टिप्पणियों से संकलित।