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2025-05-05 22:01:14 | Admin

जनजातीय भाषा एवं बहुभाषावाद संरक्षण

भारत एक ऐसी भूमि है जो अपनी आश्चर्यजनक भाषाई विविधता के लिए जानी जाती है, जिसमें सैकड़ों जनजातीय भाषाएँ शामिल हैं जो देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न अंग हैं। हालाँकि, वैश्वीकरण, आधुनिकीकरण और विभिन्न सामाजिक-आर्थिक कारकों के दबाव के कारण, इनमें से कई भाषाएँ विलुप्त होने के गंभीर खतरे का सामना कर रही हैं। इस संदर्भ में, जनजातीय भाषाओं का संरक्षण और बहुभाषावाद को बढ़ावा देना न केवल भाषाई विविधता को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि इन समुदायों की सांस्कृतिक पहचान, पारंपरिक ज्ञान और सामाजिक सामंजस्य को बनाए रखने के लिए भी आवश्यक है।

जनजातीय भाषाओं की वर्तमान स्थिति: खतरे और चुनौतियां
भारत में जनजातीय भाषाएँ देश की भाषाई परिदृश्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में अनुसूचित जनजातियों की संख्या 10.42 मिलियन है, जो कुल जनसंख्या का 8.6 प्रतिशत है, और ये समुदाय देश के दूरदराज के भागों में 705 से अधिक विशिष्ट जनजातीय समूहों में फैले हुए हैं. इन विविध जनजातीय समूहों द्वारा 461 से अधिक भाषाएँ बोली जाती हैं. हालाँकि, कई जनजातीय भाषाएँ आज अस्तित्व के संकट का सामना कर रही हैं। शहरीकरण, प्रवासन और सांस्कृतिक आत्मसात जैसे कारकों के कारण इन भाषाओं को बोलने वाले लोगों की संख्या में लगातार कमी आ रही है.
भाषा का विलुप्त होना एक जटिल प्रक्रिया है जिसके कई चरण होते हैं। यूनेस्को के अनुसार, दुनिया भर में लगभग 7,000 भाषाएँ उपयोग में हैं, जिनमें से एक तिहाई पर ख़तरा मंडरा रहा है. खतरे के स्तर के आधार पर भाषाओं को विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है, जैसे कि असुरक्षित, निश्चित रूप से खतरे में, गंभीर रूप से खतरे में और विलुप्त. भारत में भी कई जनजातीय भाषाएँ इन विभिन्न श्रेणियों में आती हैं। पीपुल्स लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया (पीएलएसआई) के अनुसार, भारत में बोली जाने वाली लगभग 10% भाषाएँ अगले 50 वर्षों में विलुप्ति की कगार पर होंगी, और भारत की तटीय भाषाएँ सबसे अधिक खतरे में हैं. एक अन्य अनुमान के अनुसार, भारत में बोली जाने वाली कुल 780 भाषाओं में से लगभग 400 भाषाएँ विलुप्त होने के कगार पर हैं.
भारत में खतरे में पड़ी जनजातीय भाषाएँ (अनुमानित संख्या)

डेटा स्रोत

खतरे में पड़ी भाषाओं की संख्या

यूनेस्को (2019)

197

भारत सरकार (1961 में मातृभाषाएँ)

1652

भारत सरकार (हालिया रिपोर्ट में मातृभाषाएँ)

1365

पीएलएसआई (अगले 50 वर्षों में विलुप्त होने का अनुमान)

लगभग 400

यह तालिका भारत में जनजातीय भाषाओं के सामने आने वाले खतरे की गंभीरता को दर्शाती है, जिसमें विभिन्न स्रोतों से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार भाषाओं की संख्या में चिंताजनक गिरावट आई है।
बहुभाषावाद: भारत की भाषाई विविधता
बहुभाषावाद एक ऐसी स्थिति है जिसमें एक व्यक्ति या समुदाय कई भाषाओं का उपयोग करता है। भारत ऐतिहासिक रूप से बहुभाषावाद की भूमि रहा है, जहाँ विभिन्न क्षेत्रों के लोग जन्म से ही एक से अधिक भाषाएँ बोलते हैं और अपने जीवनकाल में अतिरिक्त भाषाएँ सीखते हैं. भारत की भाषाई विविधता अद्वितीय है, जिसमें इंडो-आर्यन, द्रविड़, ऑस्ट्रो-एशियाई और तिब्बती-बर्मी जैसे प्रमुख भाषा परिवारों से संबंधित सैकड़ों भाषाएँ और बोलियाँ बोली जाती हैं.भारतीय संविधान ने भी 22 भाषाओं को आधिकारिक भाषाओं के रूप में मान्यता दी है.
बहुभाषावाद के कई महत्वपूर्ण लाभ हैं। यह न केवल विभिन्न सांस्कृतिक समूहों के बीच संचार और समझ को बढ़ावा देता है, बल्कि यह व्यक्तियों में संज्ञानात्मक लचीलापन, बेहतर समस्या-समाधान कौशल और सांस्कृतिक जागरूकता भी विकसित करता है. इसके अतिरिक्त, बहुभाषी व्यक्ति और समुदाय अक्सर सामाजिक और आर्थिक रूप से अधिक समृद्ध होते हैं क्योंकि वे व्यापक अवसरों और दृष्टिकोणों तक पहुँच सकते हैं.भारत जैसे विविध देश में, बहुभाषावाद राष्ट्रीय एकता और सामाजिक सद्भाव को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.
जनजातीय भाषाओं के संरक्षण के लिए सरकारी और गैर-सरकारी प्रयास
जनजातीय भाषाओं के संरक्षण के महत्व को पहचानते हुए, भारत सरकार और विभिन्न गैर-सरकारी संगठन इन भाषाओं को पुनर्जीवित और संरक्षित करने के लिए कई प्रयास कर रहे हैं। जनजातीय कार्य मंत्रालय ने 'टीआरआई को सहायता योजना' के तहत कई परियोजनाएं शुरू की हैं.इन योजनाओं के तहत द्विभाषी और त्रिभाषी शब्दकोशों का निर्माण, बहुभाषी शिक्षा के लिए प्राइमर तैयार करना, आदिवासी साहित्य का प्रकाशन, लोक परंपरा का दस्तावेजीकरण और स्वास्थ्य जागरूकता मॉड्यूल का स्थानीय जनजातीय बोलियों में अनुवाद जैसे कार्य किए जाते हैं.नई शिक्षा नीति 2020 भी छोटे बच्चों को अपनी घरेलू भाषा और मातृभाषा में जल्दी सीखने और समझने पर जोर देती है, जिसके तहत आदिवासी भाषाओं में कक्षा I, II और III के छात्रों के लिए प्राइमर तैयार किए जा रहे हैं.
जनजातीय भाषा संरक्षण के लिए सरकारी योजनाओं का बजट आवंटन 

योजना का नाम

2021-22 के लिए बजट आवंटन (करोड़ रुपये)

2022-23 के लिए बजट आवंटन (करोड़ रुपये)

2023-24 के लिए बजट आवंटन (करोड़ रुपये)

'जनजातीय अनुसंधान संस्थानों को समर्थन'

120

121

118.64

यह तालिका जनजातीय भाषाओं के संरक्षण के प्रति सरकार की वित्तीय प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
गैर-सरकारी संगठन और सामुदायिक स्तर पर भी कई महत्वपूर्ण पहलें चल रही हैं। भाषा अनुसंधान एवं प्रकाशन केंद्र, वडोदरा और बिट्स, पिलानी जैसे संस्थान आदिवासी भाषाओं, संस्कृति और जीवन-कौशल का अध्ययन और दस्तावेजीकरण कर रहे हैं.इसके अतिरिक्त, 'लुप्तप्राय भाषाओं के संरक्षण और संरक्षण योजना (एसपीपीईएल)' जैसी परियोजनाएँ 10,000 से कम वक्ताओं द्वारा बोली जाने वाली मातृभाषाओं की भाषा और संस्कृति का दस्तावेजीकरण कर रही हैं.
प्रौद्योगिकी की भूमिका
प्रौद्योगिकी जनजातीय भाषाओं के संरक्षण और बहुभाषावाद को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म देशी वक्ताओं को जुड़ने, अपनी भाषा साझा करने और संरक्षण प्रयासों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए आभासी समुदाय बनाने की सुविधा प्रदान करते हैं.विकिपीडिया जैसी क्राउडसोर्सिंग पहल लुप्तप्राय भाषाओं में सामग्री बनाने और संपादित करने के लिए ऑनलाइन समुदायों के सामूहिक प्रयास का उपयोग करती हैं.एआई-आधारित अनुवाद उपकरण संचार अंतराल को पाटने और स्वदेशी भाषाओं में जानकारी को सुलभ बनाने में मदद कर सकते हैं.सोरा भाषा परियोजना और कोंकणी भाषा पुनरुद्धार परियोजना जैसे सफल प्रौद्योगिकी-आधारित पहल भाषा पुनरुद्धार के लिए प्रौद्योगिकी का लाभ उठाने के मूर्त परिणाम दर्शाते हैं.#IndigenousLanguages और #LanguageRevival जैसे हैशटैग लोकप्रियता प्राप्त कर रहे हैं, जो इन मुद्दों में बढ़ती ऑनलाइन रुचि को दर्शाते हैं.
जनजातीय भाषाओं के विलुप्त होने का सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव
जनजातीय भाषाओं का विलुप्त होना कई गंभीर सामाजिक-सांस्कृतिक परिणामों की ओर ले जाता है. इससे सांस्कृतिक विविधता, पारंपरिक ज्ञान और मौखिक इतिहास का नुकसान होता है. भाषा हानि से सांस्कृतिक प्रथाओं और पहचान का क्षरण होता है. कई जनजातीय भाषाएँ स्थानीय पारिस्थितिक तंत्र, औषधीय पौधों और टिकाऊ कृषि पद्धतियों के बारे में विशाल ज्ञान को संहिताबद्ध करती हैं, और इन भाषाओं के विलुप्त होने से पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान भी खो सकता है. जनजातीय समुदाय स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों के भंडार हैं जो स्थानीय पारिस्थितिक तंत्र की गहरी समझ पर आधारित हैं. जनजातीय भाषाओं का विलुप्त होना विश्व की समग्र भाषाई विविधता को कम करता है.प्रत्येक भाषा मानव मन और संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं में अद्वितीय अंतर्दृष्टि प्रदान करती है. भारत में 400 से अधिक जनजातीय भाषाएँ बोली जाती हैं जो अमूल्य सांस्कृतिक यादें समेटे हुए हैं.भाषा जनजातीय समुदायों के लिए पहचान का एक महत्वपूर्ण मार्कर है, और भाषा के बिना व्यक्ति अपनी पैतृक जड़ों से कट जाते हैं और सामुदायिक बंधन कमजोर हो जाते हैं. भाषा जनजातीय समुदायों के लिए अपनी पहचान बनाए रखने और आत्मसात का विरोध करने का एक तरीका हो सकता है. भाषा के अभाव को युवाओं में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जोड़ा गया है, और भाषा दमन से आत्म-सम्मान और कल्याण संबंधी समस्याएं उत्पन्न होती हैं.
सफल जनजातीय भाषा संरक्षण परियोजनाएं
भारत और दुनिया भर में कई सफल जनजातीय भाषा संरक्षण परियोजनाएँ कार्यान्वित की गई हैं। भारत में, सोरा भाषा परियोजना (ओडिशा) डिजिटल उपकरणों का उपयोग करके भाषा का दस्तावेजीकरण और शिक्षण कर रही है. कोंकणी भाषा पुनरुद्धार में वेबसाइटों, ब्लॉगों और सोशल मीडिया समूहों के माध्यम से इंटरनेट ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. नागालैंड में, कोन्याक भाषा परियोजना बच्चों को कोन्याक बोली सिखाने के लिए ऐप्स और डिजिटल पुस्तकों का उपयोग कर रही है.
वैश्विक स्तर पर, माओरी भाषा का पुनरुद्धार (न्यूजीलैंड) सरकारी नीतियों और तकनीकी पहलों के संयोजन से वक्ताओं की संख्या में महत्वपूर्ण वृद्धि का एक उत्कृष्ट उदाहरण है.विभिन्न अमेरिकी भारतीय जनजातियों ने भी डिजिटल शब्दकोशों, ऐप्स और विसर्जन कार्यक्रमों सहित भाषा संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किए हैं.यावापाई-अपाचे राष्ट्र के लिए एक शब्दकोश ऐप और बच्चों की किताबें विकसित की गईं.चिल्कूट इंडियन एसोसिएशन की ट्रिकी रेवेन लैंग्वेज इनिशिएटिव और केनाइट्ज़ इंडियन ट्राइब का डेना'ना भाषा-शिक्षण सामग्री विकास जैसे कार्यक्रम भी सफल रहे हैं.न्यूवाकिरपेट अनिरटुलुकु कोडियाक अलुटिक भाषा मास्टर अपरेंटिस प्रोग्राम एक और उल्लेखनीय पहल है.ये परियोजनाएँ दर्शाती हैं कि सामुदायिक नेतृत्व, तकनीकी एकीकरण और सहायक नीतियों जैसे सामान्य तत्वों के माध्यम से स्वदेशी भाषाओं को सफलतापूर्वक पुनर्जीवित किया जा सकता है।
सफल जनजातीय भाषा संरक्षण परियोजनाओं के उदाहरण
 

परियोजना का नाम

स्थान

मुख्य रणनीतियाँ

परिणाम (यदि उपलब्ध हो)

सोरा भाषा परियोजना

ओडिशा, भारत

डिजिटल उपकरण, ऑनलाइन शब्दकोश, भाषा सीखने वाले ऐप, शैक्षिक वीडियो

भाषा का दस्तावेजीकरण और शिक्षण, देशी वक्ताओं और भाषा उत्साही लोगों के लिए सुलभता

कोंकणी भाषा पुनरुद्धार

भारत

वेबसाइटें, ब्लॉग, सोशल मीडिया समूह, ऑनलाइन रेडियो स्टेशन, पॉडकास्ट

भाषा और संस्कृति के प्रति रुचि का पुनरुद्धार

कोन्याक भाषा परियोजना

नागालैंड, भारत

बच्चों को सिखाने के लिए ऐप्स और डिजिटल पुस्तकें

पीढ़ीगत नुकसान से भाषा की सुरक्षा

माओरी भाषा का पुनरुद्धार

न्यूजीलैंड

सरकारी नीतियाँ, विसर्जन शिक्षा, प्रौद्योगिकी एकीकरण

वक्ताओं की संख्या में महत्वपूर्ण वृद्धि

यावापाई-अपाचे राष्ट्र के लिए भाषा उपकरण और बच्चों की किताबें

यूएसए

शब्दकोश ऐप, बच्चों की किताबें, ऑडियो रिकॉर्डिंग

भाषा सीखने और उपयोग को प्रोत्साहित करना

चिल्कूट इंडियन एसोसिएशन की ट्रिकी रेवेन लैंग्वेज इनिशिएटिव

यूएसए (अलास्का)

परिवारों को भाषा सीखने के अवसर प्रदान करना

क्षेत्र की भाषा क्षमता में वृद्धि

केनाइट्ज़ इंडियन ट्राइब का डेना'ना भाषा-शिक्षण सामग्री विकास

यूएसए (अलास्का)

संदर्भ-आधारित अनुकूलित भाषा अधिग्रहण (COLA) दृष्टिकोण का उपयोग करके सीखने की सामग्री विकसित करना

भाषा शिक्षण के लिए चरणबद्ध भाषा-शिक्षण सामग्री का विकास

यह तालिका विभिन्न सफल परियोजनाओं को दर्शाती है जो जनजातीय भाषाओं के संरक्षण के लिए विभिन्न रणनीतियों का उपयोग करती हैं।
निष्कर्ष
जनजातीय भाषाएँ और बहुभाषावाद भारत की अमूल्य भाषाई धरोहर हैं, जिनका संरक्षण न केवल भाषाई विविधता को बनाए रखने के लिए बल्कि इन समुदायों की सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक सामंजस्य को सुरक्षित रखने के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। जनजातीय भाषाओं के सामने आने वाले खतरों को देखते हुए, इन भाषाओं को विलुप्त होने से बचाने के लिए निरंतर और समन्वित प्रयासों की आवश्यकता है। सरकार, गैर-सरकारी संगठनों, समुदायों, शिक्षाविदों और प्रौद्योगिकी को मिलकर काम करना होगा ताकि इन भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए प्रभावी रणनीतियाँ विकसित की जा सकें। बहुभाषावाद को बढ़ावा देकर हम एक ऐसे समावेशी भविष्य का निर्माण कर सकते हैं जहाँ प्रत्येक भाषा और संस्कृति को सम्मान मिले और सभी को अपनी भाषाई जड़ों से जुड़े रहने का अवसर मिले।