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नीति आयोग की एक रिपोर्ट (अगस्त 2024) के अनुसार, भारत चावल की भूसी के तेल, अरंडी के बीज, कुसुम, तिल और नाइजर के उत्पादन में विश्व स्तर पर प्रथम स्थान पर है। राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन (एनएमईओ) का उद्देश्य देश के तिलहन इकोसिस्टम को मजबूत करना और खाद्य तेल उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करना है।
भारत में खाद्य तेलों की प्रति व्यक्ति घरेलू खपत में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो 2004-05 में ग्रामीण क्षेत्रों में 5.76 किलोग्राम/वर्ष और शहरी क्षेत्रों में 7.92 किलोग्राम/वर्ष से बढ़कर 2022-23 में क्रमशः 10.58 किलोग्राम/वर्ष और 11.78 किलोग्राम/वर्ष हो गई है। यह इस अवधि में ग्रामीण क्षेत्रों में 83.68 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 48.74 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। वर्ष 2023-24 के दौरान भारत का कुल खाद्य तेल उत्पादन 12.18 मिलियन टन दर्ज किया गया। देश आंतरिक उत्पादन के माध्यम से खाद्य तेलों की अपनी घरेलू मांग का केवल 44 प्रतिशत ही पूरा कर पाता है। दुनिया के सबसे बड़े तिलहन उत्पादकों में से एक होने के बावजूद, भारत अपने खाद्य तेल घाटे को पूरा करने के लिए आयात पर काफी हद तक निर्भर है। उल्लेखनीय रूप से, खाद्य तेलों पर आयात निर्भरता 2015-16 के 63.2 प्रतिशत से घटकर 2023-24 में 56.25 प्रतिशत हो गई है, जो आत्मनिर्भरता में 36.8 प्रतिशत से 43.74 प्रतिशत तक मामूली सुधार को दर्शाती है। वैश्विक परिदृश्य में भारत, अमेरिका, चीन और ब्राज़ील के बाद चौथा सबसे बड़ा देश है, जो वैश्विक तिलहन क्षेत्र का लगभग 15-20 प्रतिशत, कुल वनस्पति तेल उत्पादन का 6-7 प्रतिशत और वैश्विक खपत का 9-10 प्रतिशत योगदान देता है। घरेलू स्तर पर, भारतीय कृषि में खाद्यान्नों के बाद तिलहनों का क्षेत्रफल और उत्पादन मूल्य दूसरे स्थान पर है। नौ प्रमुख तिलहन, मूंगफली, सोयाबीन, रेपसीड-सरसों, सूरजमुखी, तिल, कुसुम, नाइजर, अरंडी और अलसी, कुल फसल क्षेत्र के 14.3 प्रतिशत हिस्से पर कब्जा करते हैं, आहार ऊर्जा में 12-13 प्रतिशत का योगदान करते हैं, और कृषि निर्यात में लगभग 8 प्रतिशत का योगदान करते हैं। फिर भी, तिलहन की अधिकांश खेती, कुल क्षेत्रफल का लगभग 76 प्रतिशत, वर्षा आधारित परिस्थितियों में होती है, जिससे उत्पादन जलवायु परिवर्तनों और उपज अस्थिरता के प्रति संवेदनशील हो जाता है। उत्पादन परिदृश्य कुछ प्रमुख राज्यों तक ही सीमित है। राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र मिलकर भारत के कुल तिलहन उत्पादन में 77.68 प्रतिशत से अधिक का योगदान करते हैं, जो विशिष्ट फसलों में क्षेत्रीय प्रभुत्व को दर्शाता है, जैसे सरसों में राजस्थान और सोयाबीन में मध्य प्रदेश।
पाम ऑयल उत्पादन की शुरूआत आंध्र प्रदेश और तेलंगाना प्रमुख पाम ऑयल उत्पादक राज्य हैं और कुल उत्पादन का 98 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं राज्यों का है। कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, छत्तीसगढ़, गोवा, ओडिशा, गुजरात और मिज़ोरम में भी पाम ऑयल की खेती का एक बड़ा क्षेत्र है। हाल ही में अरुणाचल प्रदेश, असम, त्रिपुरा, मणिपुर और नागालैंड ने भी बड़े पैमाने पर पाम ऑयल की खेती शुरू की है।
मिशन के लक्ष्य मिशन का लक्ष्य 2025-26 तक 6.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को पाम ऑयल की खेती के अंतर्गत लाना है। कच्चे पाम ऑयल (सीपीओ) का उत्पादन 2025-26 तक 11.20 लाख टन और 2029-30 तक 28 लाख टन तक पहुँचने का लक्ष्य है। 2025-26 तक 19.00 किलोग्राम/व्यक्ति/वर्ष के उपभोग स्तर को बनाए रखने के लिए उपभोक्ता जागरूकता बढ़ाना। राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन - तिलहन भारत विश्व तिलहन उत्पादन में लगभग 5-6 प्रतिशत का योगदान देता है। वित्त वर्ष 2023-24 में खली, तिलहन और गौण तेलों का निर्यात लगभग 5.44 मिलियन टन था, जिसका मूल्य 29,587 करोड़ रुपये था। मई 2025 तक भारत का तिलहन उत्पादन 42.609 मिलियन टन (एमटी) के नए उच्च स्तर पर पहुँच गया। भारत में नौ प्रमुख तिलहन फसलों का वार्षिक सकल फसल क्षेत्र में 14.3 प्रतिशत योगदान है, आहार ऊर्जा में 12-13 प्रतिशत का योगदान है और कृषि निर्यात में लगभग 8 प्रतिशत का योगदान है। भारत अरंडी, कुसुम, तिल और नाइजर के उत्पादन में प्रथम स्थान पर है, मूंगफली में दूसरे, रेपसीड-सरसों में तीसरे, अलसी में चौथे और सोयाबीन में पांचवें स्थान पर है। राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र प्रमुख तिलहन उत्पादक राज्य हैं, जो देश के कुल तिलहन उत्पादन में 77 प्रतिशत से अधिक का योगदान करते हैं।
एनएमईओ-ओएस खाद्य तेल उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए, राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन - तिलहन (एनएमईओ-ओएस) को 2024 में सात साल की अवधि, 2024-25 से 2030-31 के लिए मंजूरी दी गई थी, जिसका वित्तीय परिव्यय 10,103 करोड़ रुपये है। एनएमईओ-तिलहन प्रमुख प्राथमिक तिलहन फसलों जैसे रेपसीड-सरसों, मूंगफली, सोयाबीन, सूरजमुखी, तिल, कुसुम, नाइजर, अलसी और अरंडी का उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ कपास, नारियल, चावल की भूसी के साथ-साथ वृक्ष-जनित तिलहन (टीबीओ) जैसे द्वितीयक स्रोतों से संग्रह और निष्कर्षण दक्षता बढ़ाने पर केंद्रित है। मिशन विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों पर ध्यान केन्द्रित करता है ताकि वे विभिन्न पहलों के माध्यम से अपनी तिलहन फसल की पैदावार में सुधार कर सकें, जैसे कि आईसीएआर/सीजीआईएआर द्वारा फ्रंटलाइन प्रदर्शन (एफएलडी), केवीके द्वारा क्लस्टर फ्रंटलाइन प्रदर्शन (सीएफएलडी) और राज्य कृषि विभागों द्वारा ब्लॉक-स्तरीय प्रदर्शन (बीएलडी), ताकि तिलहन की खेती में नवीनतम उच्च उपज वाली किस्मों और उन्नत प्रौद्योगिकियों के बारे में किसानों के बीच जागरूकता पैदा की जा सके।
मिशन के उद्देश्य मिशन का लक्ष्य है: नवाचारों का उपयोग: उपज के अंतर को पाटने के लिए पहले से उपलब्ध और शीघ्र परिपक्व होने वाले नवाचारों और तकनीकी सफलताओं का उपयोग करना। प्रसार में तेजी लाना: सहकारी समितियों, एफपीओ और निजी क्षेत्र को शामिल करते हुए फसल-विशिष्ट समूहों में उन्नत बीज किस्मों और प्रौद्योगिकियों के तेजी से प्रसार को बढ़ावा देना। विस्तार को लक्षित करना: विशेष रूप से पूर्वी राज्यों में परती क्षेत्रों में तिलहन की खेती के विस्तार को प्रोत्साहित करना और प्रदर्शनों के माध्यम से अंतर-फसल को बढ़ावा देना। उन्नत बीजों की उपलब्धता बढ़ाना: गुणवत्तापूर्ण बीजों की उपलब्धता और पहुँच सुनिश्चित करने के लिए बीज उत्पादन और वितरण प्रणाली में कमियों को दूर करना। बाजार पहुँच बढ़ाना: तिलहन किसानों और मूल्य श्रृंखला भागीदारों को प्रसंस्करणकर्ताओं से जोड़ना ताकि उनकी बाजार पहुँच में सुधार हो और बेहतर लाभ सुनिश्चित हो सके। द्वितीयक तिलहनों के निष्कर्षण और संग्रहण को समर्थन देना: लक्षित हस्तक्षेपों के माध्यम से द्वितीयक तिलहनों और वृक्ष जनित तेलों के उत्पादन को बढ़ावा देना।
मिशन के लक्ष्य मिशन का लक्ष्य 2030-31 तक क्षेत्र कवरेज को 29 मिलियन हेक्टेयर (2022-23) से बढ़ाकर 33 मिलियन हेक्टेयर, प्राथमिक तिलहन उत्पादन को 39 मिलियन टन (2022-23) से बढ़ाकर 69.7 मिलियन टन और उपज को 1,353 किलोग्राम/हेक्टेयर (2022-23) से बढ़ाकर 2,112 किलोग्राम/हेक्टेयर करना है। एनएमईओ-ओपी के साथ मिलकर, इस मिशन का लक्ष्य 2030-31 तक घरेलू खाद्य तेल उत्पादन को 25.45 मिलियन टन तक पहुँचाना है, जो हमारी अनुमानित घरेलू आवश्यकता का लगभग 72 प्रतिशत पूरा करेगा। मिशन चावल और आलू की परती भूमि को लक्षित करके, अंतर-फसल को बढ़ावा देकर और फसल विविधीकरण को बढ़ावा देकर तिलहन की खेती को अतिरिक्त 40 लाख हेक्टेयर तक बढ़ाना चाहता है।.
मिशन के प्रमुख घटक एनएमईओ-ओएस के अंतर्गत, देश भर में 600 से अधिक मूल्य श्रृंखला क्लस्टरों की पहचान की गई है, जो सालाना 10 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र को कवर करते हैं। इन क्लस्टरों का प्रबंधन मूल्य श्रृंखला भागीदारों (वीसीपी) द्वारा किया जाता है, जिनमें किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) और सहकारी समितियाँ शामिल हैं। इन क्लस्टरों के किसानों को निःशुल्क उच्च गुणवत्ता वाले बीज, उत्तम कृषि पद्धतियों (जीएपी) का प्रशिक्षण और मौसम एवं कीट प्रबंधन पर सलाहकार सेवाएँ मिल रही हैं। इसके अलावा, मिशन तिलहन संग्रहण, तेल निष्कर्षण और पुनर्प्राप्ति की दक्षता बढ़ाने के लिए कटाई के बाद के बुनियादी ढाँचे की स्थापना के लिए सहायता प्रदान करता है। गुणवत्तापूर्ण बीजों की समय पर उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए, मिशन ने 'बीज प्रमाणीकरण, अनुरेखणीयता और समग्र सूची (साथी)' पोर्टल के माध्यम से एक ऑनलाइन 5-वर्षीय रोलिंग बीज योजना शुरू की, जिससे राज्यों को सहकारी समितियों, एफपीओ और सरकारी या निजी बीज निगमों सहित बीज उत्पादक एजेंसियों के साथ अग्रिम गठजोड़ स्थापित करने में मदद मिली। बीज उत्पादन के बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए सार्वजनिक क्षेत्र में 65 नए बीज केन्द्र और 50 बीज भंडारण इकाइयाँ स्थापित की जा रही हैं। इसके अतिरिक्त, खाद्य तेलों के लिए अनुशंसित आहार संबंधी दिशानिर्देशों के बारे में जन जागरूकता बढ़ाने के लिए एक सूचना, शिक्षा और संचार (आईईसी) अभियान चलाया जा रहा है, जिससे देश भर में स्वस्थ उपभोग पैटर्न को प्रोत्साहित किया जा सके।
मिशन को लागू किया जाना एनएमईओ-ओएस सभी राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों में सामान्य राज्यों, दिल्ली और पुडुचेरी के लिए 60:40 और पूर्वोत्तर राज्यों व पहाड़ी राज्यों के लिए 90:10 के अनुपात में वित्त पोषण के साथ लागू किया जाएगा, और केन्द्र शासित प्रदेशों व केंद्रीय एजेंसियों के लिए 100 प्रतिशत वित्त पोषण होगा। एनएमईओ-ओएस को तीन-स्तरीय संरचना के माध्यम से कार्यान्वित किया जाता है:
तिलहन उत्पादन में भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए अन्य पहल देश को तिलहन उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने के लिए निम्नलिखित कदम भी उठाए गए हैं: सरकार ने 15वें वित्त आयोग के दौरान वित्त वर्ष 2025-26 तक प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (पीएम-आशा) को जारी रखने की मंज़ूरी दे दी है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) व्यापक फसल बीमा कवरेज प्रदान करती है, जो किसानों को बुवाई से पहले से लेकर कटाई के बाद तक फसल के नुकसान के जोखिमों से बचाती है। इसमें खाद्यान्न, तिलहन और वाणिज्यिक बागवानी फसलें शामिल हैं, जिन्हें संबंधित राज्य सरकार द्वारा विशेष रूप से अधिसूचित किया जाता है। सस्ते खाद्य तेलों के आयात को हतोत्साहित करने के लिए, सरकार ने पाम, सूरजमुखी और सोयाबीन जैसे कच्चे खाद्य तेलों पर प्रभावी सीमा शुल्क 5.5 प्रतिशत से बढ़ाकर 16.5 प्रतिशत कर दिया है। रिफाइंड खाद्य तेलों पर शुल्क में उल्लेखनीय वृद्धि की गई है, जो 13.75 प्रतिशत से बढ़कर 35.75 प्रतिशत हो गया है। इन उपायों का उद्देश्य घरेलू उत्पादकों के लिए समान अवसर उपलब्ध कराना है और साथ ही आयात पर निर्भरता कम करना है। किसानों को बेहतर लाभ सुनिश्चित करने के लिए सोयाबीन, सरसों, मूंगफली और अन्य तिलहन जैसी प्रमुख तिलहन फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में उल्लेखनीय वृद्धि की गई है।
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